
मैया, मैंने नहीं खाया — वह नन्हा कान्हा जो पकड़ में न आया
चोरी बिल्कुल ठीक-ठाक हुई थी। मटकी खाली थी, फर्श आटे से सफ़ेद था, और वृंदावन के बालक इतना हँस रहे थे कि भाग भी न सके।
तभी किसी ने पदचाप सुनी। मैया यशोदा आ रही थीं।
सबूत चेहरे पर ही लगा था
कान्हा मुड़े — गाल पर माखन, उँगलियों पर माखन, कान के ऊपर घुँघराले बालों में भी माखन — और माँ की आँखों में सीधे देखा, उस शांति के साथ जो केवल उसी के पास होती है जिसने कुछ सोचा ही नहीं।
"मैया... मैंने नहीं खाया!"
"बंदरों ने खाया होगा!"
जब इससे बात न बनी, तो उन्होंने वही किया जो हर सदी का हर बच्चा करता है — दोष देने के लिए कोई और ढूँढ़ लिया। एक नन्हा हाथ उठा और छत की कड़ियों की ओर इशारा कर दिया, जहाँ वृंदावन के बंदर अपना माखन लिए यह सारा दृश्य देख रहे थे।
"वो देखो! उन्होंने खाया होगा!"
पीछे खड़े दोस्तों की रही-सही गंभीरता भी टूट गई। और बंदर, बिना किसी सहायता के, खाते रहे।
माँ सब जानती है
यशोदा जानती थीं। वे सदा से जानती थीं। द्वार खोलने से पहले ही जानती थीं।
पर गोकुल की हर माँ एक क्षण को पहचानती है — वह क्षण, जब चुनना होता है कि सही सिद्ध होना है, या इस आनंद को चलते रहने देना है। उन्होंने डाँटा नहीं। वे मुस्कुरा दीं।
और जिस क्षण वे मुस्कुराईं, कान्हा दौड़ पड़े। 🦚
गोकुल की हँसी कभी क्यों नहीं थमी
वे आँगन पार कर गलियों में निकल गए, और हँसी सदा की तरह पीछे-पीछे चली — घर से घर, मटकी से मटकी, जब तक पूरा गाँव उस अपराध में शामिल न हो गया जिसका हल कोई चाहता ही नहीं था।
क्योंकि जहाँ कान्हा का बचपन था, वहाँ हर दिन एक नई कहानी जन्म लेती थी। असली चोरी तो वही थी — और वृंदावन की किसी माँ ने उसे कभी वापस नहीं माँगा।
जय श्री कृष्ण। 💙
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