
निधिवन — वह वन जो साँझ ढलते ही खाली कर दिया जाता है
वृंदावन के हृदय में एक ऐसा वन है जैसा धरती पर दूसरा नहीं। इसके वृक्ष टेढ़े-मेढ़े और खोखले हैं, धरती की ओर झुके हुए — मानो नृत्य की मुद्रा में ठहरे हुए नर्तक। निधिवन में कुछ भी वनों के साधारण नियमों से नहीं चलता — और रातें तो बिल्कुल नहीं।
हर संध्या अंतिम आरती के बाद पुजारी द्वार पर ताला लगाते हैं और बिना पीछे मुड़े लौट जाते हैं। पक्षी मौन हो जाते हैं। वृंदावन में किसी से न डरने वाले बंदर भी उजाला रहते-रहते दीवारें लाँघ जाते हैं।
वे वृक्ष जो वृक्ष नहीं हैं
निधिवन की तुलसी जोड़ों में उगती है — डालियाँ आपस में गुँथी हुई, तने ऐसे मुड़े हुए जैसे कमर में बाँहें डाले हों। किसी ने इन्हें कभी बीज देते नहीं देखा, और कोई इनकी एक टहनी तोड़ने का साहस नहीं करता।
वृंदावन के लोग फुसफुसाकर इसका कारण बताते हैं: ये वृक्ष हैं ही नहीं। ये ब्रज की गोपियाँ हैं — जो तपती दुपहरी में जड़ बनी खड़ी रहती हैं, उस घड़ी की प्रतीक्षा में जब ताले लग जाएँ और वे अपना असली रूप धर सकें।
हर रात का रास
क्योंकि कहते हैं, यहाँ हर रात श्रीकृष्ण लौटते हैं। बाँसुरी बजती है। यमुना सुनने के लिए ठहर जाती है। और निधिवन के चाँदनी-भीगे कुंजों में रासलीला — राधा और गोपियों संग प्रभु का शाश्वत नृत्य — फिर वैसे ही आरम्भ होता है जैसे पाँच हज़ार वर्ष पहले होता था।
द्वापर युग बीत गया, पर रास समाप्त नहीं हुआ। उसने बस अपने द्वार बंद कर लिए।
सजी हुई सेज
वन के भीतर एक छोटा-सा मंदिर है — रंग महल। हर शाम पुजारी उसे दुल्हन के कक्ष की तरह सजाते हैं — चंदन की सेज, रेशमी साड़ी, चूड़ियाँ, माखन-मिश्री, जल का लोटा, और भोर के लिए दातुन।
हर सुबह जब ताले खुलते हैं — सेज पर सलवटें मिलती हैं। मिश्री जूठी होती है। लोटा खाली। दातुन इस्तेमाल की हुई। पाँच हज़ार वर्षों में वह अतिथि कभी किसी की पकड़ में नहीं आया।
जो देखने रुक गए
फिर भी हर पीढ़ी में कोई-न-कोई दुस्साहस करता है। कोई संशयी वृक्ष के खोखले तने में छिप जाता है। कोई योगी रास देखने का प्रण ठान लेता है। कोई चोर रंग महल के सोने के लोभ में रुक जाता है।
सुबह वे मिलते हैं — कोई पागल, कोई गूँगा, कोई सदा के लिए लापता। यह वन अपना नियम बड़ी निर्मम करुणा से निभाता है: रासलीला कोई तमाशा नहीं है। वह एक रहस्य है, और मनुष्य की आँखें उसमें कभी आमंत्रित नहीं थीं।
इसलिए निधिवन जाएँ तो दिन के उजाले में जाएँ। मुड़े हुए वृक्षों को प्रणाम करें। और संध्या का शंख बजते ही बंदरों के साथ लौट आएँ — क्योंकि कुछ द्वार हमें रोकने के लिए नहीं, रास को शाश्वत रखने के लिए बंद किए जाते हैं।
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