
बालगोपाल — नन्हा माखन चोर
वृंदावन के हर घर में, माखन की मटकी हर हफ़्ते थोड़ी और ऊँची टँगती, थोड़ी और चतुराई से छत से बाँधी जाती — और फिर भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। नन्हे कान्हा अपने मित्रों के कंधों पर चढ़ जाते, उलटी मटकियों पर संतुलन साधते, और वहाँ तक पहुँच जाते जिसे कोई माँ अंततः सुरक्षित समझती।
बात कभी माखन की नहीं थी
वृंदावन की गोपियाँ अपनी मटकी खाली और रसोई आटे से सनी पाकर, हर बार, क्रोधित होने का नाटक करतीं। वे यशोदा मैया के द्वार शिकायत लेकर जातीं — और उसी क्षण पिघल जातीं जब कान्हा उनके पीछे से झाँकते, उँगलियों पर अब भी माखन लगा, आँखों में इतनी निश्छल शरारत कि दंड देना असंभव हो जाता।
वह मुस्कान जो क्रोध को पिघला देती है
यही माखनचोरी की कथाओं का सच्चा रहस्य है: बात कभी माखन की नहीं थी। जिस भी गोपी की मटकी खाली हुई, उसे बदले में कुछ बहुत अधिक मूल्यवान मिला — एक ऐसे बालक को कुछ क्षण और निहारने का सुख, जो इतना आनंदमय जीवंत था कि उसे डाँटना सूर्योदय को अधिक चमकीला होने के लिए डाँटने जैसा लगता।
जहाँ कान्हा हैं, वहाँ आनंद है
नन्हे कान्हा जहाँ भी जाते, हँसी साथ चलती — पदचिह्नों, आटे और क्षमा की एक लकीर, जो सदा उनकी अगली शरारत तक पहुँचाती। यही कारण है कि आज भी वृंदावन के बचपन की कोई स्मृति बिना मुस्कान के नहीं सुनाई जाती।
जय श्री कृष्ण। 🦚
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